चुनाव प्रक्रिया में इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के माध्यम से मतदान पर बहस गरमा गई है। पिछले दिनों कुछ नागरिक संगठनों ने दिल्ली और चैन्नई में कार्यशाला का आयोजन किया। इसमें उन्होंने ऐसे अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को आमंत्रित किया था, जो यूरोप के कुछ देशों और अमेरिका के अधिकांश प्रांतों में वोटिंग मशीन में हेराफेरी सिद्ध करने वालों में शामिल रह चुके हैं। इन विशेषज्ञों में हालैंड के कंप्यूटर हैकर रोप गोंगरिज्प, यूनिवर्सिटी आफ मिशिगन में कंप्यूटर साइंस के प्रोफेसर और इलेक्ट्रोनिक वोटिंग सुरक्षा के विशेषज्ञ डा. एलेक्स हाल्डरमैन और एटार्नी डा. टिल जैगर शामिल थे। रोप गोंगरिज्प ने एक टेलीविजन पर सीधे प्रसारण में वोटिंग मशीन को हैक कर दिखाया था और अपने देश में ईवीएम को प्रतिबंधित करवाने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। डा. टिल जैगर ने जर्मन फेडेरल कंस्टीट्यूशनल कोर्ट में ईवीएम के खिलाफ जिरह की थी जिसके परिणामस्वरूप अदालत ने जर्मनी में इन मशीनों से मतदान पर रोक लगा दी थी।
भारत की ओर से हैदराबाद के जाने-माने हैक्टिविस्ट ने ईवीएम की भेद्यता पर अपने विचार रखे। भारत में सबसे पहले इन्होंने ही ईवीएम आधारित चुनाव प्रक्रिया की ईमानदारी के खिलाफ लाल झंडा उठाया था। गोंगरिज्प और डा. हाल्डरमैन के अनुसार इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों की निर्माण प्रक्रिया के समय, मतदान के दौरान और मतदान के पश्चात जालसाजी की जा सकती है। इसके अलावा वोटिंग के दौरान पोलिंग बूथ पर भी इनके माध्यम से धांधली संभव है। वे आश्वस्त हैं कि भारतीय ईवीएम भी जर्मनी, हालैंड या आयरलैंड में प्रयुक्त की गई मशीनों से अलग नहीं हैं, जहां इन्हें नकार दिया गया है। चुनाव में धांधली ईवीएम की नियंत्रण इकाई में ट्रोजन चिप लगाकर भी की जा सकती है। यह चिप ईवीएम स्क्रीन पर मनचाहा परिणाम दिखाएगी।
दूसरे शब्दों में, मतदाताओं की पसंद जो भी हो, नियंत्रण इकाई हैकर्स की याजना के अनुसार ही संख्या दर्शाएगी। गोंगरिज्प चुनाव में पारदर्शिता, निष्पक्षता और पुष्टिकरण के मुख्य पक्षकार हैं। उनकी तकनीकी राय के आधार पर ही जर्मनी में इलेक्ट्रोनिक मशीनों को चुनाव प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया। उनका कहना है, 'जब मशीन के भीतर वोटों की गिनती होती है तो परिणाम की पुनर्जांच का कोई रास्ता नहीं बचता और चुनाव में पारदर्शिता खत्म हो जाती है।' पारदर्शिता के अभाव में इलेक्ट्रोनिक वोटिंग जालसाजी का माध्यम बन गई हैं। कोई नहीं जानता की मशीन के अंदर क्या चल रहा है। यह ऐसा मुद्दा है जिस पर जर्मन कंस्टीट्यूशन कोर्ट ने ईवीएम मशीनों को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। इसका कहना है कि संविधान चुनाव की सार्वजनिक प्रकृति पर जोर देता है और इसकी जांच के लिए तमाम जरूरी कदम उठाने की आवश्यकता को रेखांकित
करता है।
इन विशेषज्ञों के इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों को एकदम खारिज करने के बावजूद ईवीएम में भारत की जनता को बेहद भरोसा है और इसकी जबरदस्त साख है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन मशीनों की अविश्वसनीयता के बारे में जनता को जागरूक करने के लिए अभियान नहीं छेड़ा गया है। हालांकि, विभिन्न दलों के नेता इन मशीनों के बारे में चौकन्ने हैं और विपक्षी दल मशीनों के माध्यम से चुनाव में धांधली का आरोप लगाते रहे हैं, लेकिन ये मशीनों की गड़बड़ी साबित करने के लिए पुख्ता साक्ष्यों का सहारा नहीं ले पाए थे। हालांकि हरी प्रसाद जैसे लोग चुनाव आयोग से यह मांग कर रहे हैं कि वह उन्हें ईवीएम में गड़बड़ी की संभाव्यता साबित करने का एक मौका दें। शुरुआत में तो आयोग ने इस दिशा में आगे बढ़ने के संकेत दिए किंतु अचानक उसने पैर पीछे खींच लिए और पिछले सितंबर को हरी प्रसाद व उनके साथियों के ईवीएम मशीनों को चुनौती देने वाले प्रदर्शन पर रोक लगा दी। आयोग पीछे क्यों हटा?
दो अन्य भारतीय, ईवीएम के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले डा. सुब्रहमण्यम स्वामी और विख्यात चुनाव विश्लेषक व 'डेमोक्रेसी एट रिस्क : कैन वी ट्रस्ट आवर इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशींस' पुस्तक के रचियता जीवीएल नरसिंहा राव भी इस अभियान में कूद पड़े। इस पुस्तक में भारत, अमेरिका और यूरोप में ईवीएम मशीनों का इतिहास बताया है। राव के अनुसार, जिन राजनेताओं ने ईवीएम के प्रति शंका जताई है, उनमें भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी, उड़ीसा चुनाव में कांग्रेस की हार का दोष ईवीएम पर मढ़ने वाले केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश करात, जनता दल के अध्यक्ष शरद यादव, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव, तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी, तेलुगू देशम नेता चंद्रबाबू नायडु, आल इंडिया अन्ना द्रविड मुनेत्र कड़गम नेता जयललिता और पीएमके के नेता शामिल हैं।
इस सूची को देखने से एहसास होता है कि तीनों ज्ञात राष्ट्रीय गठबंधनों और विभिन्न क्षेत्रों में हर किसी के मन में ईवीएम मशीनों को लेकर शंका है। इनमें से करात चुनाव आयोग को अधिकारिक रूप से लिखित शिकायत कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर अनेक सवाल खड़े हो चुके हैं। इनमें शामिल हैं : निर्माण स्तर पर मशीन में ट्रोजन चिप लगाने की संभावना, उत्पादन स्तर पर चिप में फेरबदल करना, तकनीकी प्रक्रिया पर चुनाव आयोग का नियंत्रण न होना और तीसरे पक्ष द्वारा जांच-पड़तान करना संभव न होना। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को ईवीएम निर्माण का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेना चाहिए, तीसरे पक्ष द्वारा औचक निरीक्षण करने की अनुमति प्रदान करनी चाहिए और ईवीएम मशीनों का विभिन्न राज्यों में औचक स्थानांतरण करना चाहिए।
विशेषज्ञों से बातचीत के आधार पर राव ने निष्कर्ष निकाला है कि ईवीएम मशीनों के माध्यम से चुनाव में आठ तरह से धांधली की जा सकती है। चुनाव आयोग ने इस आधार पर इन दलीलों को गलत ठहराना चाहता है कि भारतीय ईवीएम किसी तंत्र (इंटरनेट) से जुड़ी न होकर स्वतंत्र मशीनें हैं। इसलिए ईवीएम के आपरेटिंग सिस्टम पर कोई भी जताना गलत है। जर्मनी में कंस्टीट्यूशन कोर्ट में याचिका दायर करने वाले सोफ्टवेयर इंजीनियर डा. उलरिच वीजनर इस प्रकार की दलीलों की धज्जिायां उड़ा चुके हैं। शपथपत्र में डा. स्वामी ने डा. वीजनर को उद्धृत करते हुए कहा है कि हालैंड, जर्मनी और आयरलैंड में भी ईवीएम इंटरनेट से जुड़ी न होकर स्वतंत्र मशीनें थीं। सीधी सी बात है कि जो भी इन मशीनों को खोलने और सोफ्टवेयर बदलने की पहुंच रखता है वह इनमें किसी भी प्रकार की कार्यात्मकता ला सकता है।
अगर चुनाव आयोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लोगों का विश्वास कायम रखना चाहता है तो उसे इन विशेषज्ञों द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब देना होगा। आयोग के जड़ व गैर-पारदर्शी रवैये से लगता है कि या तो उसके पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है या फिर वह कुछ छिपा रहा है।
[ए सूर्यप्रकाश: लेखक विधि मामलों के जानकार हैं]
sabhar dainik jagran
Thursday, February 25, 2010
Tuesday, February 16, 2010
दिग्विजय की वोट यात्रा
26/11 के बाद विगत शनिवार को पुणे के जर्मन बेकरी रेस्त्रा में हुए आतंकी हमले में 9 लोगों की जान चली गई और 45 घायल हो गए। मृतकों में चार विदेशी महिलाएं हैं। सन 2001 के 9/11 के आतंकी हमले के बाद अमेरिका में एक भी आतंकवादी घटना नहीं हुई। इसके विपरीत भारत में यह सिलसिला थम नहीं रहा। क्यों?
क्या हम इस तथ्य से इनकार कर सकते हैं कि पुणे की यह दुखद घटना काग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की आजमगढ़ की 'तीर्थयात्रा' के कुछ दिनों बाद घटित हुई है? इस बीच समाचारपत्रों में यह चर्चा भी थी कि युवराज राहुल गाधी भी आजमगढ़ दर्शन का कार्यक्रम बना रहे हैं।
दिल्ली के जामिया नगर स्थित बटला हाउस में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ के बाद उत्तर प्रदेश का आजमगढ़ देश की विभिन्न जाच एजेंसियों के निशाने पर है और खोजबीन से इस बात की पुष्टि भी हो चुकी है कि देश में आतंकवाद के तार आजमगढ़ से गहरे जुड़े हैं। पिछले कुछ वषरें में उत्तर प्रदेश, खासकर आजमगढ़ और पूर्वी उत्तर प्रदेश के आसपास का क्षेत्र जिहादियों का गढ़ बनता जा रहा है, जो दाऊद के गुगरें से लेकर कई आतंकवादियों के सुरक्षित ठिकाने के रूप में सामने आ रहा है। किंतु बटला हाउस मुठभेड़ के बाद से ही मुस्लिम समाज के कट्टरपंथी इसे फर्जी मुठभेड़ बताकर देश की सुरक्षा एजेंसियों पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। मुस्लिम वोट बैंक पर गिद्ध दृष्टि रखने वाले राजनीतिक दल भी उनके साथ हैं। इस कथित मुठभेड़ के खिलाफ आजमगढ़ के कट्टरपंथियों की फौज एक पूरी ट्रेन को ही 'उलेमा एक्सप्रेस' बनाकर दिल्ली आ धमकी थी।
बटला हाउस मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादी आजमगढ़ के संजरपुर के निवासी थे। बाद में इस गाव से कई अन्य संदिग्धों की गिरफ्तारी भी हुई। इससे पूर्व अहमदाबाद बम धमाकों के सिलसिले में आजमगढ़ के ही एक मौलाना, अबू बशर को गिरफ्तार किया गया था। बशर की गिरफ्तारी के बाद उसके घर मातमपुर्सी के लिए सपा-बसपा और काग्रेस में होड़ लग गई थी। यह होड़ बटला हाउस मुठभेड़ के बाद और तेज हुई है। इसी सिलसिले में पिछले दिनों काग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह आजमगढ़ पहुंचे थे। वे कथित फर्जी मुठभेड़ में मारे गए युवकों के परिजनों से मिले और उसके बाद लखनऊ में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में यहा तक कहा कि 'न्याय में देरी, न्याय न देने के समान है।' जब सत्ताधारी दल राष्ट्रहितों की कीमत पर वोटबैंक की राजनीति करेगा तो स्वाभाविक है कि इससे सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल गिरेगा और राष्ट्रविरोधी शक्तियों को ताकत मिलेगी।
प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी चिदंबरम आतंकवाद के खात्मे को सरकार की बड़ी प्राथमिकता बताते हैं, दूसरी ओर काग्रेस का वरिष्ठ नेता आतंकवादियों के साथ हुई मुठभेड़ पर ऐसे समय में सवाल खड़ा करता है, जब न केवल साक्ष्य, बल्कि उसी मुठभेड़ का हिस्सा रहा एक आतंकवादी पुलिस की गिरफ्त में हो और पूछताछ में मारे जाने वालों के आतंकी गतिविधियों में शामिल होने की पुष्टि कर रहा हो। क्या इस दोमुंहेपन की नीति से आतंकवाद का सामना किया जा सकता है?
लखनऊ के संवाददाता सम्मेलन में दिग्विजय सिंह ने जो कहा, उससे पलटते हुए दिल्ली में यह कहा कि वह मुठभेड़ को फर्जी बताने की स्थिति में नहीं हैं। इसके बाद भोपाल में उन्होंने अपने आजमगढ़ दौरे का स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि आजमगढ़ के कई मुस्लिम युवाओं पर चार राज्यों में पचास से अधिक मामले लादे गए हैं और इसीलिए उन्हें लगता है कि इनके निपटारे के लिए विशेष न्यायालय व सीबीआई की मदद लेनी चाहिए और उन्हें जबरन फंसाने के लिए झूठे प्रकरण नहीं लादने चाहिए। यह कैसी मानसिकता है?
पिछले दिनों पुलिस के हत्थे चढ़े शाहजाद अहमद पर दिल्ली के सीरियल बम ब्लास्ट के साथ बटला मुठभेड़ में शामिल होने का आरोप है। पूछताछ में उसने मारे गए युवाओं को अपना साथी बताया है। फिर इसके एक दिन बाद दिग्विजय उन मृतकों के परिजनों से मिलने क्यों गए? जाच एजेंसियों पर सवाल खड़ा करने वाले कठमुल्लों से मिलकर देश की कानून-व्यवस्था को लाछित क्यों किया? आजमगढ़ के कट्टरपंथी मुसलमानों को 'राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग' और उच्च न्यायालय द्वारा की गई जाच पर भरोसा नहीं है तो अब मुठभेड़ की जाच किससे कराई जाए?
वस्तुत: आतंकवाद को लेकर काग्रेस का दोहरापन छिपा नहीं है। बटला हाउस मुठभेड़ में दो पुलिस कर्मियों की भी मौत हुई थी। अपने जवानों की शहादत को अपमानित करते हुए काग्रेस के कुछ नेता मुठभेड़ के फौरन बाद बटला हाउस पहुंचे थे, जहा मुस्लिम वोट बैंक की खातिरदारी में मुलायम सिंह यादव सरीखे नेता पहले से ही विराजमान थे। सत्तासीन काग्रेस ने अपने नेताओं को आतंकवादियों का साथ देने वाले कट्टरपंथी तत्वों से दूरी बनाने का निर्देश देने की बजाए सुरक्षाकर्मियों पर सवाल खड़ा किया, जिन्होंने सभ्य समाज को लहूलुहान करने वाले दहशतगदरें को गिरफ्तार करने के लिए अपनी जान दाव पर लगा दी थी। सुरक्षाकर्मियों द्वारा मुस्लिम समाज के उत्पीड़न का आरोप समझ से परे है। न तो पुलिस और न ही सरकार ने आतंकवाद को लेकर मुस्लिम समुदाय को कठघरे में खड़ा किया है। आजमगढ़ के मुसलमानों के लिए यदि यह देश सर्वोपरि है तो उन्हें अपने समुदाय में छिपे उन भेड़ियों की तलाश करनी चाहिए, जो दहशतगदरें को पनाह देते हैं। मुंबई पर इतना बड़ा आतंकी हमला हुआ, क्या वह सीमा पार कर अचानक घुस आए जिहादियों के द्वारा संभव था? मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथियों द्वारा ऐसे मददगारों को संरक्षण क्यों मिलता है? और ऐसे कट्टरपंथियों के समर्थन में पूरा समाज किस जुनून में आ खड़ा होता है? आतंकवाद के सिलसिले में जिन युवकों की गिरफ्तारी हुई है, उन पर इस देश के संविधान के अनुरूप कानूनी कार्रवाई चल रही है। हाल में कोलकाता स्थित अमेरिकी दूतावास पर हमला करने वालों को लंबी सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने दंडित किया है। वषरें की सुनवाई के बाद सन 1993 में मुंबई में बम विस्फोट करने वालों में से कुछ को अब सजा सुनाई गई है, कई रिहा कर दिए गए। इस देश की कानून-व्यवस्था की निष्पक्षता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि मुंबई हमलों में जिंदा पकड़ा गया अजमल कसाब सरकारी मेहमान बना हुआ है। उसके खिलाफ वीडियो फुटेज हैं, चश्मदीद गवाह हैं, किंतु सुनवाई चल रही है। ऐसे में मुस्लिम प्रताड़ना का आरोप समझ से परे है।
मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ काग्रेस का याराना नया नहीं है। शाहबानो प्रकरण इसका ज्वलंत प्रमाण है। सच्चर और रंगनाथ आयोग के बहाने मुसलमानों की दयनीय दशा के एकमात्र उद्धारक होने का ढोंग करने वाली काग्रेस ही वस्तुत: उनके पिछड़ेपन का कसूरवार भी है। करीब साठ सालों तक देश पर काग्रेस का शासन रहा है। यह समुदाय पिछड़ा ही बना रहा। वही काग्रेस अब उनके उत्थान के लिए अलग से आरक्षण देने का झासा दे रही है। काग्रेस के लिए मुस्लिम समुदाय एक वोट बैंक से अधिक नहीं है और यह बात जागरूक मुसलमानों की समझ में आने लगी है।
[बलबीर पुंज: लेखक भाजपा के राज्यसभा सासद हैं]
साभार दैनिक जागरण
क्या हम इस तथ्य से इनकार कर सकते हैं कि पुणे की यह दुखद घटना काग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की आजमगढ़ की 'तीर्थयात्रा' के कुछ दिनों बाद घटित हुई है? इस बीच समाचारपत्रों में यह चर्चा भी थी कि युवराज राहुल गाधी भी आजमगढ़ दर्शन का कार्यक्रम बना रहे हैं।
दिल्ली के जामिया नगर स्थित बटला हाउस में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ के बाद उत्तर प्रदेश का आजमगढ़ देश की विभिन्न जाच एजेंसियों के निशाने पर है और खोजबीन से इस बात की पुष्टि भी हो चुकी है कि देश में आतंकवाद के तार आजमगढ़ से गहरे जुड़े हैं। पिछले कुछ वषरें में उत्तर प्रदेश, खासकर आजमगढ़ और पूर्वी उत्तर प्रदेश के आसपास का क्षेत्र जिहादियों का गढ़ बनता जा रहा है, जो दाऊद के गुगरें से लेकर कई आतंकवादियों के सुरक्षित ठिकाने के रूप में सामने आ रहा है। किंतु बटला हाउस मुठभेड़ के बाद से ही मुस्लिम समाज के कट्टरपंथी इसे फर्जी मुठभेड़ बताकर देश की सुरक्षा एजेंसियों पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। मुस्लिम वोट बैंक पर गिद्ध दृष्टि रखने वाले राजनीतिक दल भी उनके साथ हैं। इस कथित मुठभेड़ के खिलाफ आजमगढ़ के कट्टरपंथियों की फौज एक पूरी ट्रेन को ही 'उलेमा एक्सप्रेस' बनाकर दिल्ली आ धमकी थी।
बटला हाउस मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादी आजमगढ़ के संजरपुर के निवासी थे। बाद में इस गाव से कई अन्य संदिग्धों की गिरफ्तारी भी हुई। इससे पूर्व अहमदाबाद बम धमाकों के सिलसिले में आजमगढ़ के ही एक मौलाना, अबू बशर को गिरफ्तार किया गया था। बशर की गिरफ्तारी के बाद उसके घर मातमपुर्सी के लिए सपा-बसपा और काग्रेस में होड़ लग गई थी। यह होड़ बटला हाउस मुठभेड़ के बाद और तेज हुई है। इसी सिलसिले में पिछले दिनों काग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह आजमगढ़ पहुंचे थे। वे कथित फर्जी मुठभेड़ में मारे गए युवकों के परिजनों से मिले और उसके बाद लखनऊ में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में यहा तक कहा कि 'न्याय में देरी, न्याय न देने के समान है।' जब सत्ताधारी दल राष्ट्रहितों की कीमत पर वोटबैंक की राजनीति करेगा तो स्वाभाविक है कि इससे सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल गिरेगा और राष्ट्रविरोधी शक्तियों को ताकत मिलेगी।
प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी चिदंबरम आतंकवाद के खात्मे को सरकार की बड़ी प्राथमिकता बताते हैं, दूसरी ओर काग्रेस का वरिष्ठ नेता आतंकवादियों के साथ हुई मुठभेड़ पर ऐसे समय में सवाल खड़ा करता है, जब न केवल साक्ष्य, बल्कि उसी मुठभेड़ का हिस्सा रहा एक आतंकवादी पुलिस की गिरफ्त में हो और पूछताछ में मारे जाने वालों के आतंकी गतिविधियों में शामिल होने की पुष्टि कर रहा हो। क्या इस दोमुंहेपन की नीति से आतंकवाद का सामना किया जा सकता है?
लखनऊ के संवाददाता सम्मेलन में दिग्विजय सिंह ने जो कहा, उससे पलटते हुए दिल्ली में यह कहा कि वह मुठभेड़ को फर्जी बताने की स्थिति में नहीं हैं। इसके बाद भोपाल में उन्होंने अपने आजमगढ़ दौरे का स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि आजमगढ़ के कई मुस्लिम युवाओं पर चार राज्यों में पचास से अधिक मामले लादे गए हैं और इसीलिए उन्हें लगता है कि इनके निपटारे के लिए विशेष न्यायालय व सीबीआई की मदद लेनी चाहिए और उन्हें जबरन फंसाने के लिए झूठे प्रकरण नहीं लादने चाहिए। यह कैसी मानसिकता है?
पिछले दिनों पुलिस के हत्थे चढ़े शाहजाद अहमद पर दिल्ली के सीरियल बम ब्लास्ट के साथ बटला मुठभेड़ में शामिल होने का आरोप है। पूछताछ में उसने मारे गए युवाओं को अपना साथी बताया है। फिर इसके एक दिन बाद दिग्विजय उन मृतकों के परिजनों से मिलने क्यों गए? जाच एजेंसियों पर सवाल खड़ा करने वाले कठमुल्लों से मिलकर देश की कानून-व्यवस्था को लाछित क्यों किया? आजमगढ़ के कट्टरपंथी मुसलमानों को 'राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग' और उच्च न्यायालय द्वारा की गई जाच पर भरोसा नहीं है तो अब मुठभेड़ की जाच किससे कराई जाए?
वस्तुत: आतंकवाद को लेकर काग्रेस का दोहरापन छिपा नहीं है। बटला हाउस मुठभेड़ में दो पुलिस कर्मियों की भी मौत हुई थी। अपने जवानों की शहादत को अपमानित करते हुए काग्रेस के कुछ नेता मुठभेड़ के फौरन बाद बटला हाउस पहुंचे थे, जहा मुस्लिम वोट बैंक की खातिरदारी में मुलायम सिंह यादव सरीखे नेता पहले से ही विराजमान थे। सत्तासीन काग्रेस ने अपने नेताओं को आतंकवादियों का साथ देने वाले कट्टरपंथी तत्वों से दूरी बनाने का निर्देश देने की बजाए सुरक्षाकर्मियों पर सवाल खड़ा किया, जिन्होंने सभ्य समाज को लहूलुहान करने वाले दहशतगदरें को गिरफ्तार करने के लिए अपनी जान दाव पर लगा दी थी। सुरक्षाकर्मियों द्वारा मुस्लिम समाज के उत्पीड़न का आरोप समझ से परे है। न तो पुलिस और न ही सरकार ने आतंकवाद को लेकर मुस्लिम समुदाय को कठघरे में खड़ा किया है। आजमगढ़ के मुसलमानों के लिए यदि यह देश सर्वोपरि है तो उन्हें अपने समुदाय में छिपे उन भेड़ियों की तलाश करनी चाहिए, जो दहशतगदरें को पनाह देते हैं। मुंबई पर इतना बड़ा आतंकी हमला हुआ, क्या वह सीमा पार कर अचानक घुस आए जिहादियों के द्वारा संभव था? मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथियों द्वारा ऐसे मददगारों को संरक्षण क्यों मिलता है? और ऐसे कट्टरपंथियों के समर्थन में पूरा समाज किस जुनून में आ खड़ा होता है? आतंकवाद के सिलसिले में जिन युवकों की गिरफ्तारी हुई है, उन पर इस देश के संविधान के अनुरूप कानूनी कार्रवाई चल रही है। हाल में कोलकाता स्थित अमेरिकी दूतावास पर हमला करने वालों को लंबी सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने दंडित किया है। वषरें की सुनवाई के बाद सन 1993 में मुंबई में बम विस्फोट करने वालों में से कुछ को अब सजा सुनाई गई है, कई रिहा कर दिए गए। इस देश की कानून-व्यवस्था की निष्पक्षता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि मुंबई हमलों में जिंदा पकड़ा गया अजमल कसाब सरकारी मेहमान बना हुआ है। उसके खिलाफ वीडियो फुटेज हैं, चश्मदीद गवाह हैं, किंतु सुनवाई चल रही है। ऐसे में मुस्लिम प्रताड़ना का आरोप समझ से परे है।
मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ काग्रेस का याराना नया नहीं है। शाहबानो प्रकरण इसका ज्वलंत प्रमाण है। सच्चर और रंगनाथ आयोग के बहाने मुसलमानों की दयनीय दशा के एकमात्र उद्धारक होने का ढोंग करने वाली काग्रेस ही वस्तुत: उनके पिछड़ेपन का कसूरवार भी है। करीब साठ सालों तक देश पर काग्रेस का शासन रहा है। यह समुदाय पिछड़ा ही बना रहा। वही काग्रेस अब उनके उत्थान के लिए अलग से आरक्षण देने का झासा दे रही है। काग्रेस के लिए मुस्लिम समुदाय एक वोट बैंक से अधिक नहीं है और यह बात जागरूक मुसलमानों की समझ में आने लगी है।
[बलबीर पुंज: लेखक भाजपा के राज्यसभा सासद हैं]
साभार दैनिक जागरण
Wednesday, January 20, 2010
इण्डेन शर्मा गैस एजेंसी उत्तम नगर ने ग्राहकों को परेशान कर रखा है
नई दिल्ली। इण्डेन शर्मा गैस एजेंसी उत्तम नगर ने नए ग्राहकों को परेशान कर रखा है। यह गैस एजेंसी इण्डेन गैस की घर-घर सप्लाई व नए कनेक्शन बुक करती है। इन्होंने यह नियम बना रखा है कि ग्राहक को नया गैस कनेक्शन तीन बजे बाद ही मिलेगा। मगर यदि कोई ग्राहक यदि सुबह अपने नौकरी पर जाता हो तो उसे कनेक्शन कैसे मिलेगा। बार-बार विनम्रता पूर्वक कहने पर भी यहां का स्टॉफ मदद करने को नही तैयार होता। इसके साथ ये सारे डोकूमेंट होने पर भी नए-नए बहाने लेकर परेशान करते हैं।
ये नए कनेक्शन मांगने वाले को इतना तंग करते हैं कि या तो वो वहां जाना बन्द कर देता है या इनकी धन पूजा करे तभी काम होगा। डब्लूडब्लूडब्लू डॉट आईओसीएल डॉट कॉम पर जाने के बाद पता चलता है कि नया कनेक्शन उसे मिल सकता है जिसके पास इनमें से एक एक निवास पहचान हो- जैसे राशनकार्ड, बिजली बिल, टेलीफोन बिल, पासपोर्ट, इमप्लायर्स सर्टिफिकेट, फ्लैट एलाटमेंट, पजेशन लेटर, हॉउस रजिस्ट्रेशन पेपर, एलआईसी पॉलिसी, ओटर आइडेंटिटी कॉर्ड, रेंट रिसिप्ट, पैन कोर्ड या ड्राइवरी लाइसेंस रखता हो।
मगर उत्तम नगर की इण्डेन शर्मा गैस एजेंसी इण्डियन ऑयल कंपनी से भी उपर हो गई है। यदि कोई व्यक्ति राशन कार्ड रखता हो मगर रेंट पर हो तो उसके लिए एफीडेविट, बिजली बिल, रेंट एग्रीमेंट, ओटर आइडेंटिटी कॉर्ड आदि सब चाहिए। जब इस तरह के इतने डोकूमेंट चाहिए तो कंपनी क्यों नही इन सबको अपनी बेबसाइट में मेंशन किया। होना यह चाहिए कि जिस व्यक्ति के पास राशनकार्ड है और रेंट पर रह रहा है तो वो मकान मालिक से लिखवा के दे दे मगर ये लोग नए गैस कनेक्शन देने के नाम पर किसी व्यक्ति को इतना परेशान जलील करते हैं कि वो व्यक्ति आना ही छोड़ दे। क्या ये लोग इस तरह की हरकत कर जनता की सेवा कर रहे हैं। किसी शिकायत के लिए एसिस्टेंट मैनेजर, एरिया मैनेजर या स्टेट मैनेजर को फोन करो तो कोई फोन ही नही उठाता। ये लोग जनता की सेवा करने के लिए बैठे हैं या जनता को परेशान करने के लिए बैठे हैं।
अभी आगे-आगे देखना है कि ये कितना पापड़ बेलवाते हैं।
इण्डेन गैस शर्मा गैस एजेंसी उत्तम नगर ने ग्राहकों को परेशान कर रखा है
नई दिल्ली। इण्डेन गैस शर्मा एजेंसी उत्तम नगर नए ग्राहकों को परेशान कर रखा है। यह गैस एजेंसी इण्डेन गैस की घर-घर सप्लाई व नए कनेक्शन बुक करती है। इन्होंने यह नियम बना रखा है कि ग्राहक को नया गैस कनेक्शन तीन बजे बाद ही मिलेगा। मगर यदि कोई ग्राहक यदि सुबह अपने नौकरी पर जाता हो तो उसे कनेक्शन कैसे मिलेगा। बार-बार विनम्रता पूर्वक कहने पर भी यहां का स्टॉफ मदद करने को नही तैयार होता। इसके साथ ये सारे डोकूमेंट होने पर भी नए-नए बहाने लेकर परेशान करते हैं।
ये नए कनेक्शन मांगने वाले को इतना तंग करते हैं कि या तो वो वहां जाना बन्द कर देता है या इनकी धन पूजा करे तभी काम होगा। डब्लूडब्लूडब्लू डॉट आईओसीएल डॉट कॉम पर जाने के बाद पता चलता है कि नया कनेक्शन उसे मिल सकता है जिसके पास इनमें से एक एक निवास पहचान हो- जैसे राशनकार्ड, बिजली बिल, टेलीफोन बिल, पासपोर्ट, इमप्लायर्स सर्टिफिकेट, फ्लैट एलाटमेंट, पजेशन लेटर, हॉउस रजिस्ट्रेशन पेपर, एलआईसी पॉलिसी, ओटर आइडेंटिटी कॉर्ड, रेंट रिसिप्ट, पैन कोर्ड या ड्राइवरी लाइसेंस रखता हो।
मगर उत्तम नगर की इण्डेन शर्मा गैस एजेंसी इण्डियन ऑयल कंपनी से भी उपर हो गई है। यदि कोई व्यक्ति राशन कार्ड रखता हो मगर रेंट पर हो तो उसके लिए एफीडेविट, बिजली बिल, रेंट एग्रीमेंट, ओटर आइडेंटिटी कॉर्ड आदि सब चाहिए। जब इस तरह के इतने डोकूमेंट चाहिए तो कंपनी क्यों नही इन सबको अपनी बेबसाइट में मेंशन किया। होना यह चाहिए कि जिस व्यक्ति के पास राशनकार्ड है और रेंट पर रह रहा है तो वो मकान मालिक से लिखवा के दे दे मगर ये लोग नए गैस कनेक्शन देने के नाम पर किसी व्यक्ति को इतना परेशान जलील करते हैं कि वो व्यक्ति आना ही छोड़ दे। क्या ये लोग इस तरह की हरकत कर जनता की सेवा कर रहे हैं। किसी शिकायत के लिए एसिस्टेंट मैनेजर, एरिया मैनेजर या स्टेट मैनेजर को फोन करो तो कोई फोन ही नही उठाता। ये लोग जनता की सेवा करने के लिए बैठे हैं या जनता को परेशान करने के लिए बैठे हैं।
अभी आगे-आगे देखना है कि ये कितना पापड़ बेलवाते हैं।
राजीव कुमार
9911850406
rajeevkumar905@gmail.com
Wednesday, January 6, 2010
मकर संक्राति – पतंगो का रंगबिरंगी त्यौहारगुजरात में आंतराष्ट्रीय पतंग महोत्सव की धूम
मकर संक्राति – पतंगो का रंगबिरंगी त्यौहारगुजरात में आंतराष्ट्रीय पतंग महोत्सव की धूम
32 देशो से 87 पतंगबाज इस महोत्सव में भाग लेंगेमहोत्सव के दौरान अहमदाबाद का आसमान रंगीन हो जाता है300 करोड का बिजनस गुजरात को मिलता हैः गुजराती जानते है कि त्यौहारो से भी कैसे मुनाफा कमाया जा सकता है।
- निलेष शुक्ला
विश्वभर में भारत ही एक ऐसा देश है जहां सबसे अधिक त्यौहार मनाये जाते है। भारत वर्ष की परंपरा रही है कि वह त्यौहारों को उत्सव के रुप में मनाकर खुशी हांसिल करता है। इसमें भी गुजराती उत्सव को मनाने में सबसे आगे रहते है और मजे की बात यह है कि वे उत्सव मनाने के साथ-साथ उससे भी अपना मुनाफा कमाना नहीं छोडते। शायद इसीलिए कहा जाता है कि गुजरातीयों की नस-नस में बिजनस बसा हुआ है। मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जबसे गुजरात में उत्सवो को मनाने का सिलसिला शुरु किया है तबसे गुजरात का होटल बिजनस तिगुना बढ गया है। मोदी जी कहते है कि हमने हमारी पहचान केवल 12 रुपये की किंमत से बनाई है फिर वो पतंग हो या डांडिया, जबकि अन्य लोग इसी पहचान के लिए लाखो रुपये खर्च करते है।
गुजरात में वर्ष के अंत में नवरात्रि और कच्छ उत्सव का सफलता पूर्वक आयोजन करने के बाद नववर्ष की शुरुआत अंतराष्ट्रीय पतंग महोत्सव से की जाती है। यह त्यौहार 10 से 14 जनवरी 2010 तक अहमदाबाद में मनाया जायेगा। इस उत्सव में केवल घरेलु पतंगबाज ही नहीं अपितु आंतराष्ट्रीय स्तर के पतंगबाज हिस्सा लेते है। इस वर्ष 32 देशो से 87 पतंगबाज इसमें भाग लेने के लिए आनेवाले है। जिसमें विदेशो से बल्गारीया, फ्रांस, कोलंबिया, मलेशिया, युनाईटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, न्युजिलेन्ड, स्वीट्जरलेन्ड, सिंगापुर, स्वीडन वगेरे देश भाग लेंगे। श्री पी.के गेरा, निवासी आयुक्त, दिल्ली, गुजरात सरकार ने जानकारी दी कि गुजरात सरकार ने इन सभी देशो के एम्बेसेडर व डिप्लोमेट्स को आमंत्रित किया गया है एवं अपने देश में से राजस्थान, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश के पतंगबाज इसमें भाग लेंगे। पतंग महोत्सव को आंतराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने का श्रेय गुजरात के मुख्यमंत्री को जाता है। इससे गुजरात को 300 करोड रुपयो का व्यापार मिलता है। गुजराती अच्छी तरह से जानते है कि त्यौहारो से भी कैसे मुनाफा कमाया जा सकता है। इससे गृह उद्योग को भी बहुत लाभ होता हैं। घर में ही औरते और बच्चे पतंग बनाने का काम करते हैं कमाई करते हैं। यहां तरह-तरह की पतंगे जैसे गोल, चील, चांदपर, आखियो, पावलो, पोणीया या फिर रोकेट और रात के समय उडाने के लिए लालटेनवाली पतंग खास बिकती है। पूरा आकाश रंग-बिरंगी पतंगो से घिरा रहता हैं।
प्राचीन काल के बहुत से चित्र ऐसे हैं जिसमें भगवान कृष्ण को पतंग उडाते देख सकते हैं। उस समय की पुस्तको में भी पतंग का उल्लेख मिलता है। भारत में मुगल समय में पतंगबाजी का शौक लोकप्रियता के शिखर पर था। अनेक मुगल बेगमो और शहजादो को पतंग उडाने का शौक था। उस समय पतंग का उपयोग प्रेमी को संदेश पहुंचाने के लिए किया जाता था। मध्य काल में संपूर्ण भारत पतंगो से प्रसिद्ध हो गया था। लखनउ व दिल्ली में पतंगो की प्रतियोगिताएं योजी जाती थी। अंतिम बादशाह बहादूरशाह जफर भी पतंग उडाने का शौक रखते थे। उनके समय में यमुना के दोनों किनारो पर पतंग उडाने की प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। दिल्ली व उत्तर भारत के अन्य शहरों में सावन-भादों में पतंग उडाने का रिवाज है। 15 अगस्त के दिन तो आसमान तिरंगी पतंगो से घिर जाता है।
पतंग उडाने का आनंद केवल भारतीय ही लेते हैं ऐसा नहीं हैं। विदेशो में भी पतंग बहुत ही आनंद के साथ उडाई जाती हैं। अमरिका में तो पतंग उडाने के इतिहास को जानने के लिए एक म्युजियम बनाया गया हैं। जिसमें पतंग बनानेवाले कारीगरों के बारे में और जग प्रसिद्ध अलग-अलग तरह की पतंगो के बारे में रोचक जानकारी दी गई हैं। इस म्युजियम का उदघाटन 21 अगस्त 1990 को हुआ था।
थाईलेन्ड में पतंगः यहां 13वीं सदी में पतंग बौद्ध धर्म के लोग भगवान का आशीर्वाद पाने के लिए उडाते थे। और जब वे पतंग उडाते थे तब वे एक अनोखा "हमींग" जैसी आवाज भी करते थे जिससे भगवान तक उनकी आवाज पहुंच सके। आजकल वे वर्षा ऋतु के प्रारंभ में पतंग उडाते हैं जिसमें वे एक बडी सी पतंग जिसे "चुला" कहा जाता है और उसके साथ अन्य छोटी-छोटी पतंगे जिसे "पाकापाओस" कहा जाता हैं उसे उडाते हैं। दो अलग प्रकार की पतंगों को एक-दूसरे को अपनी ओर खिंचने का प्रयास किया जाता है और इस खेल को देखने के लिए मैदान में हजारों की संख्या में लोग इकट्ठे होते हैं।
मलेशिया में पतंगः मलेशिया की पतंगे थाईलेन्ड की पतंगो से जरा अलग होती हैं। यहां पर मोटे तौर पर चकोर पतंग बनाई जाती हैं लेकिन उसकी खासियत यह है कि उसमे कलाकारी की हुई लंबी पूंछ लगाई जाती हैं क्योंकि वहां हवा बहुत तेज चलती हैं। इन्डोनेशिया में पतंगः यहां भी पतंग बहुत समय पहले से ही उपयोग में ली जाती हैं। यहां जो सबसे पहले पतंग बनाई गई थी वह पेड के पत्तो से बनाई गई थी, जिसका उपयोग सागर में दूर मछली पकडने के लिए किया जाता था। इन्डोनेशिया के चारों और आईलेन्ड हैं इसलिए वहां तेज हवाएं चलती हैं इसलिए य़हां पर बडी-बडी पतंगे वनाई जाती हैं जो पक्षी या पशु के आकार की होती हैं। इन पतंगो को बनाने के लिए बांस की लकडी, सूती कपडा या नायलोन का उपयोग किया जाता हैं।
चीन में पतंगः ऐसा कहा जाता है कि चीन में सबसे पहले पतंग का उपयोग दूरी मापने के लिए किया था। वहां भी पतंग उडाने का आनंद एक उत्सव की तरह ही मनाया जाता है। चीन में नौंवे महीने का नवां दिन पतंग उडाने का दिन माना जाता है। कहा जाता है कि 3000 वर्ष पहले चीन के सेनापति ह्युन त्स्यांग ने पतंग को बांस के टुकडे के साथ बांधकर उसे शत्रु के देश में भेजते थे, और जब पतंग में से हवा पास होने से उसमें से सीटी जैसा आवाज निकलता जिसे सुनकर दुश्मन भाग जाते थे। अपने लश्कर के जवानो को संदेश पहुंचाने के लिए भी पतंग का उपयोग किया जाता था। चीन में 300 तरह की अलग-अलग प्रकार की पतंगे बनाई जाती है। चीन की राजधानी बीजिंग में सबसे बडा पतंग का संग्रहालय बनाया गया है।
पतंग का उपयोग लश्कर के अलावा वैज्ञानिक शोध के लिए भी किया जाता था। 1749 में स्कोटलेन्ड के एलेकजेन्डर विल्सन ने पतंग की मदद से विविध उंचाइयों पर उष्णतामान का माप निकाला था। राइट बंधुओने ओस्ट्रिया के लोरेन्स हाग्रेवना 1884 में सिडनी में बक्से के आकार का पतंग बनाकर उसमें वजन डालकर उसे उडाने में सफलता हांसिल की थी।
इस पर्व में जहां लोग पतंग उडाने का आनंद उठाते हैं वहीं मासुम पक्षी भी इसका शिकार हो जाते हैं। क्योंकि अचानक से उनके स्वच्छंद आकाश में पतंग रुपी अनेक डोर की बाधाएं आ जाती हैं जो उन्हें उडने में बाधा डालती हैं और ये निर्दोष या तो घायल होते हैं या मारे जाते हैं। एक अंदाज अनुसार एक ही दिन में करीब 10,000 पक्षी घायल होते हैं या मर जाते हैं। इसलिए पतंग रसिको को चाहिये की वे पतंग उडाते समय इस बात का भी ध्यान रखे की कोई निर्दोष पक्षी घायल न हो।
तो चलिए हम भी पतंग उडाने की तैयारी करते हैं लेकिन जरा संभलकर इससे किसी को कोई नुकसान न हो.... चली रे चली रे पतंग मेरी चली रे..... ये काटा..... वो काटा.....
32 देशो से 87 पतंगबाज इस महोत्सव में भाग लेंगेमहोत्सव के दौरान अहमदाबाद का आसमान रंगीन हो जाता है300 करोड का बिजनस गुजरात को मिलता हैः गुजराती जानते है कि त्यौहारो से भी कैसे मुनाफा कमाया जा सकता है।
- निलेष शुक्ला
विश्वभर में भारत ही एक ऐसा देश है जहां सबसे अधिक त्यौहार मनाये जाते है। भारत वर्ष की परंपरा रही है कि वह त्यौहारों को उत्सव के रुप में मनाकर खुशी हांसिल करता है। इसमें भी गुजराती उत्सव को मनाने में सबसे आगे रहते है और मजे की बात यह है कि वे उत्सव मनाने के साथ-साथ उससे भी अपना मुनाफा कमाना नहीं छोडते। शायद इसीलिए कहा जाता है कि गुजरातीयों की नस-नस में बिजनस बसा हुआ है। मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जबसे गुजरात में उत्सवो को मनाने का सिलसिला शुरु किया है तबसे गुजरात का होटल बिजनस तिगुना बढ गया है। मोदी जी कहते है कि हमने हमारी पहचान केवल 12 रुपये की किंमत से बनाई है फिर वो पतंग हो या डांडिया, जबकि अन्य लोग इसी पहचान के लिए लाखो रुपये खर्च करते है।
गुजरात में वर्ष के अंत में नवरात्रि और कच्छ उत्सव का सफलता पूर्वक आयोजन करने के बाद नववर्ष की शुरुआत अंतराष्ट्रीय पतंग महोत्सव से की जाती है। यह त्यौहार 10 से 14 जनवरी 2010 तक अहमदाबाद में मनाया जायेगा। इस उत्सव में केवल घरेलु पतंगबाज ही नहीं अपितु आंतराष्ट्रीय स्तर के पतंगबाज हिस्सा लेते है। इस वर्ष 32 देशो से 87 पतंगबाज इसमें भाग लेने के लिए आनेवाले है। जिसमें विदेशो से बल्गारीया, फ्रांस, कोलंबिया, मलेशिया, युनाईटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, न्युजिलेन्ड, स्वीट्जरलेन्ड, सिंगापुर, स्वीडन वगेरे देश भाग लेंगे। श्री पी.के गेरा, निवासी आयुक्त, दिल्ली, गुजरात सरकार ने जानकारी दी कि गुजरात सरकार ने इन सभी देशो के एम्बेसेडर व डिप्लोमेट्स को आमंत्रित किया गया है एवं अपने देश में से राजस्थान, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश के पतंगबाज इसमें भाग लेंगे। पतंग महोत्सव को आंतराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने का श्रेय गुजरात के मुख्यमंत्री को जाता है। इससे गुजरात को 300 करोड रुपयो का व्यापार मिलता है। गुजराती अच्छी तरह से जानते है कि त्यौहारो से भी कैसे मुनाफा कमाया जा सकता है। इससे गृह उद्योग को भी बहुत लाभ होता हैं। घर में ही औरते और बच्चे पतंग बनाने का काम करते हैं कमाई करते हैं। यहां तरह-तरह की पतंगे जैसे गोल, चील, चांदपर, आखियो, पावलो, पोणीया या फिर रोकेट और रात के समय उडाने के लिए लालटेनवाली पतंग खास बिकती है। पूरा आकाश रंग-बिरंगी पतंगो से घिरा रहता हैं।
प्राचीन काल के बहुत से चित्र ऐसे हैं जिसमें भगवान कृष्ण को पतंग उडाते देख सकते हैं। उस समय की पुस्तको में भी पतंग का उल्लेख मिलता है। भारत में मुगल समय में पतंगबाजी का शौक लोकप्रियता के शिखर पर था। अनेक मुगल बेगमो और शहजादो को पतंग उडाने का शौक था। उस समय पतंग का उपयोग प्रेमी को संदेश पहुंचाने के लिए किया जाता था। मध्य काल में संपूर्ण भारत पतंगो से प्रसिद्ध हो गया था। लखनउ व दिल्ली में पतंगो की प्रतियोगिताएं योजी जाती थी। अंतिम बादशाह बहादूरशाह जफर भी पतंग उडाने का शौक रखते थे। उनके समय में यमुना के दोनों किनारो पर पतंग उडाने की प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। दिल्ली व उत्तर भारत के अन्य शहरों में सावन-भादों में पतंग उडाने का रिवाज है। 15 अगस्त के दिन तो आसमान तिरंगी पतंगो से घिर जाता है।
पतंग उडाने का आनंद केवल भारतीय ही लेते हैं ऐसा नहीं हैं। विदेशो में भी पतंग बहुत ही आनंद के साथ उडाई जाती हैं। अमरिका में तो पतंग उडाने के इतिहास को जानने के लिए एक म्युजियम बनाया गया हैं। जिसमें पतंग बनानेवाले कारीगरों के बारे में और जग प्रसिद्ध अलग-अलग तरह की पतंगो के बारे में रोचक जानकारी दी गई हैं। इस म्युजियम का उदघाटन 21 अगस्त 1990 को हुआ था।
थाईलेन्ड में पतंगः यहां 13वीं सदी में पतंग बौद्ध धर्म के लोग भगवान का आशीर्वाद पाने के लिए उडाते थे। और जब वे पतंग उडाते थे तब वे एक अनोखा "हमींग" जैसी आवाज भी करते थे जिससे भगवान तक उनकी आवाज पहुंच सके। आजकल वे वर्षा ऋतु के प्रारंभ में पतंग उडाते हैं जिसमें वे एक बडी सी पतंग जिसे "चुला" कहा जाता है और उसके साथ अन्य छोटी-छोटी पतंगे जिसे "पाकापाओस" कहा जाता हैं उसे उडाते हैं। दो अलग प्रकार की पतंगों को एक-दूसरे को अपनी ओर खिंचने का प्रयास किया जाता है और इस खेल को देखने के लिए मैदान में हजारों की संख्या में लोग इकट्ठे होते हैं।
मलेशिया में पतंगः मलेशिया की पतंगे थाईलेन्ड की पतंगो से जरा अलग होती हैं। यहां पर मोटे तौर पर चकोर पतंग बनाई जाती हैं लेकिन उसकी खासियत यह है कि उसमे कलाकारी की हुई लंबी पूंछ लगाई जाती हैं क्योंकि वहां हवा बहुत तेज चलती हैं। इन्डोनेशिया में पतंगः यहां भी पतंग बहुत समय पहले से ही उपयोग में ली जाती हैं। यहां जो सबसे पहले पतंग बनाई गई थी वह पेड के पत्तो से बनाई गई थी, जिसका उपयोग सागर में दूर मछली पकडने के लिए किया जाता था। इन्डोनेशिया के चारों और आईलेन्ड हैं इसलिए वहां तेज हवाएं चलती हैं इसलिए य़हां पर बडी-बडी पतंगे वनाई जाती हैं जो पक्षी या पशु के आकार की होती हैं। इन पतंगो को बनाने के लिए बांस की लकडी, सूती कपडा या नायलोन का उपयोग किया जाता हैं।
चीन में पतंगः ऐसा कहा जाता है कि चीन में सबसे पहले पतंग का उपयोग दूरी मापने के लिए किया था। वहां भी पतंग उडाने का आनंद एक उत्सव की तरह ही मनाया जाता है। चीन में नौंवे महीने का नवां दिन पतंग उडाने का दिन माना जाता है। कहा जाता है कि 3000 वर्ष पहले चीन के सेनापति ह्युन त्स्यांग ने पतंग को बांस के टुकडे के साथ बांधकर उसे शत्रु के देश में भेजते थे, और जब पतंग में से हवा पास होने से उसमें से सीटी जैसा आवाज निकलता जिसे सुनकर दुश्मन भाग जाते थे। अपने लश्कर के जवानो को संदेश पहुंचाने के लिए भी पतंग का उपयोग किया जाता था। चीन में 300 तरह की अलग-अलग प्रकार की पतंगे बनाई जाती है। चीन की राजधानी बीजिंग में सबसे बडा पतंग का संग्रहालय बनाया गया है।
पतंग का उपयोग लश्कर के अलावा वैज्ञानिक शोध के लिए भी किया जाता था। 1749 में स्कोटलेन्ड के एलेकजेन्डर विल्सन ने पतंग की मदद से विविध उंचाइयों पर उष्णतामान का माप निकाला था। राइट बंधुओने ओस्ट्रिया के लोरेन्स हाग्रेवना 1884 में सिडनी में बक्से के आकार का पतंग बनाकर उसमें वजन डालकर उसे उडाने में सफलता हांसिल की थी।
इस पर्व में जहां लोग पतंग उडाने का आनंद उठाते हैं वहीं मासुम पक्षी भी इसका शिकार हो जाते हैं। क्योंकि अचानक से उनके स्वच्छंद आकाश में पतंग रुपी अनेक डोर की बाधाएं आ जाती हैं जो उन्हें उडने में बाधा डालती हैं और ये निर्दोष या तो घायल होते हैं या मारे जाते हैं। एक अंदाज अनुसार एक ही दिन में करीब 10,000 पक्षी घायल होते हैं या मर जाते हैं। इसलिए पतंग रसिको को चाहिये की वे पतंग उडाते समय इस बात का भी ध्यान रखे की कोई निर्दोष पक्षी घायल न हो।
तो चलिए हम भी पतंग उडाने की तैयारी करते हैं लेकिन जरा संभलकर इससे किसी को कोई नुकसान न हो.... चली रे चली रे पतंग मेरी चली रे..... ये काटा..... वो काटा.....
फिर हुआ एक पत्रकार पर जानलेवा हमला
कटिहार, बिहार ।बिहार मैं अपराधिओं के हौसले फिर से बुलंद नजर आने लगे हैं . तजा घटनाक्रम मैं अधिकारीयों और दलालों के गठजोर से पनपे गुंडों ने एक टी वी पत्रकार को अपना निशाना बनाया है . इ टीवी बिहार से जुड़े पत्रकार प्रवीण ठाकुर पर बीते बुधवार की रात को कटिहार के सदर अस्पताल मैं कुछ गुंडों ने उस समय हमला बोल दिया जब वे समाचार संकलन कर रहे थे , इस हमले मैं मैं वे बुरी तरह घायल हो गएँ हैं और अस्पताल मैंभर्ती हैं.
बताया जाता है की बिहार खासकर कटिहार के सरकारी अस्पतालों मैं स्वास्थ विभाग के अधिकारीयों और डाक्टरों की मिलीभगत से एक मजबूत माफियातंत्र काम करता है जो न केवल अस्पतालों मैं घटिया दवाईओं अवं अन्य जीवन रक्षक चीजों की आपूर्ति करता है वरन मरीजों को डाक्टरों द्वारा लिखे घटिया दवाओं को खास दुकानों से खरीदने को मजबूर भी करता है , और यही कारण है की यह तत्वा नहीं चाहते की अस्पताल परिसर मैं पत्रकारों की आवाजाही हो और इसका सबसे बड़ा सबूत है पत्रकार प्रवीण ठाकुर पर हमला ....क्योंकि श्री ठाकुर की माने तो वे एक फोलोउप न्यूज़ करने गए थे जिसमे की अस्पताल प्रशासन के पहल पर एक मानसिक मरीज को इलाज के लिए सरकारी खर्च पर बहार भेजा जाना था ..जो की अस्पताल प्रशासन के मनविये चहरे को ही दिखता.
हालाँकि इस परिसर मैं ये कोई नई घटना नहीं है अन्य पत्रकारों की मने तो यहाँ औए दिन पत्रकारों के साथ दुर्वेव्हार होते रहते है.
इस पुरे घटनाक्रम मैं प्रशाशन की भूमिका वैसी ही है जैसा आमतोर पर होता है . पत्रकारों के लाख निवेदन के बाबजूद प्रशासन इस माफिया तंत्र के खिलाफ कोई ठोस जाँच करवा कार्रवाई करने के पक्ष मैं नजर नहीं आता.
रमेश मिश्र , कटिहार
बताया जाता है की बिहार खासकर कटिहार के सरकारी अस्पतालों मैं स्वास्थ विभाग के अधिकारीयों और डाक्टरों की मिलीभगत से एक मजबूत माफियातंत्र काम करता है जो न केवल अस्पतालों मैं घटिया दवाईओं अवं अन्य जीवन रक्षक चीजों की आपूर्ति करता है वरन मरीजों को डाक्टरों द्वारा लिखे घटिया दवाओं को खास दुकानों से खरीदने को मजबूर भी करता है , और यही कारण है की यह तत्वा नहीं चाहते की अस्पताल परिसर मैं पत्रकारों की आवाजाही हो और इसका सबसे बड़ा सबूत है पत्रकार प्रवीण ठाकुर पर हमला ....क्योंकि श्री ठाकुर की माने तो वे एक फोलोउप न्यूज़ करने गए थे जिसमे की अस्पताल प्रशासन के पहल पर एक मानसिक मरीज को इलाज के लिए सरकारी खर्च पर बहार भेजा जाना था ..जो की अस्पताल प्रशासन के मनविये चहरे को ही दिखता.
हालाँकि इस परिसर मैं ये कोई नई घटना नहीं है अन्य पत्रकारों की मने तो यहाँ औए दिन पत्रकारों के साथ दुर्वेव्हार होते रहते है.
इस पुरे घटनाक्रम मैं प्रशाशन की भूमिका वैसी ही है जैसा आमतोर पर होता है . पत्रकारों के लाख निवेदन के बाबजूद प्रशासन इस माफिया तंत्र के खिलाफ कोई ठोस जाँच करवा कार्रवाई करने के पक्ष मैं नजर नहीं आता.
रमेश मिश्र , कटिहार
Monday, January 4, 2010
हिन्दू संस्कृति से ही मानवता की रक्षा संभव - डॉ. मोहनराव भागवत
प्रयाग, 03 जनवरी (विश्व संवाद केन्द्र)। राश्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन राव भागवत ने माघ मेला स्थित परेड ग्राउण्ड में आयोजित संघ समागम में हजारों गणवेशधारी स्वयंसेवकों व नागरिकों को सम्बोधित करते हुए कहा कि भोगवादी, प्रकृतिविरोधी, पिश्चमी जीवन शैली को छोड़कर और हिन्दू संस्कृति को अपनाकर ही पर्यावरण एवं मानवता की रक्षा की जा सकती है।
उन्होंने कहा कि यदि दुनिया के सभी देश पर्यावरण को लेकर समय रहते अगर नहीं चेता तो कुछ ही दिनों में दुनिया से मानव जीवन ही समाप्त हो जायेगा। इसका एकमात्र उपाय त्यागपूर्ण भारतीय संस्कृति से संभव है। इसलिए हम सबको प्रकृति के एक अंग होने के नाते प्रकृति से उतना ही लें जितना मूझे चाहिए। श्री भागवत ने बहती उर्जा का इस्तेमाल करने पर बल दिया और कहा कि बहती रुपी उर्जा जैसे सूर्य, नदी, जंगल, व खनिज सम्पदा का इस्तेमाल शोशण के बजाय दोहन के रुप में करें, तो सब कुछ नियंत्रित हो सकता है।
संघ प्रमुख ने कहा कि स्वयंसेवकों द्वारा एक लाख से अधिक सेवा के कार्य बिना सरकार के सहयोग से चलायें जा रहें है। इस प्रकार के कार्यो में समान जनता के सहयोग की अपेक्षा की। उन्होंने कहा कि संघ का कार्य शाखा के माध्यम से व्यक्ति निर्माण करना है। यदि संघ को जानना हो तो बड़ी संख्या में स्वयंसेवक बनकर जान सकते है। उन्होंने अधिक से अधिक स्वयंसेवक बनने का आह्वान किया। श्री भागवत ने कहा कि संघ का कार्य न किसी के विरोध में और नहीं ही किसी के प्रतिक्रिया में है, इसे समझने के लिए संघ की शाखा में आना जरुरी है। उन्होंने शाखा में आने का आह्वान करते हुए कहा कि आइए संघ के दरवाजे खुले हैं। जब तक इसकी कार्य प्रणाली को नहीं समझेगें, तब तक आत्मा नहीं समझ पायेंगे। संघ का काम अनुभव का है। अनुभव करके ही इसकी कार्य प्रणाली को समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि संघ की नीतियां सनातन हिन्दू संस्कृति की रही हैं। जो त्याग, सहिश्णु व सर्वधर्म समभाव पर टिकी हैं। इसका कट्टरता से कोई वास्ता नहीं है। भारतीय संस्कृति कभी यह नहीं सिखाती `केवल हम सही हैं। बाकी सब गलत।´ विश्व बन्धुत्व का इससे बड़ा उदाहरण अन्य किसी संस्कृति में नहीं है।
उन्होंने कहा कि जहां हिन्दू जनसंख्या प्रभावी नहीं है वहां ‘सडयन्त्रकारी शक्तियों द्वारा देश विरोधी गतिविधियों बढ़ रही है। इन सारे समस्याओं को समाधान हिन्दुत्व में है। उन्होंने कहा कि विदेशी ताकतों द्वारा यह विभ्रम फैलाया जा रहा है कि हिन्दू भी आतंकवादी होता है जबकि संघ का मानना है कि हिन्दू आतंकवादी हो ही नहीं सकता है यदि कोई हो गया भी तो हिन्दू समाज उसके साथ कभी खड़ा नही हो सकता। जबतक हिन्दुत्व की विचारधारा के आधार पर देश के सभी वर्गो, समुदायों एवं जातियों को एकसूत्र में बांधा नहीं जायेगा तब तक वैभवशाली राश्ट्र का निर्माण नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि तथाकथित राजनेता अपनी निजि स्वार्थो के कारण जाति, पन्थ, भाशा, सम्प्रदाय व क्षेत्रवाद को बढ़ावा दे रहे है। इन नेताओं का देश की सुरक्षा व समस्या से कोई लेना देना नहीं है इनको सिर्फ कुर्सी चाहिए। तेलंगाना राज्य के मुद्दे पर कहा कि ये तुच्छ राजनीति करने वाले राजनेताओं की देन है। आज उनका कुछ नहीं बिगड़ रहा है उनके इस करतुत के कारण देश की सम्पति जल रही है। उन्होंने सन् 1952 के श्री गुरुजी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा उनका मानना था कि भाशावाद के नाम पर राज्य का बंटवारा नहीं होेना चाहिए। आज इस प्रकार की समस्या हम सबके सामने दिख रही है।
उन्होंने कहा कि भारत की सीमाऐं चारो तरफ से असुरक्षित है। चीन अपने सामंतवादी नीति के तहत हमको चारों तरफ से घेर रहा है। उन्होंने पाकिस्तान का नाम लेकर कहा कि वह भारत से दुश्मनी छोड़ नहीं सकता है क्योंकि उसका जन्म ही दुश्मनी से हुयी। बांग्लादेश हमारे सैनिकों को मारता है और हमारे सीमाओं के अन्दर घुसपैठ करके अपना दावा ठोकता है। धीरे-धीरे बाग्लादेश आतंकवादियों का गढ़ बनता जा रहा है समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं हुआ तो आने वाले समय में हमारे सामने खतरा बढ़ेगा। इसलिए जोर देकर उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद भी सरकार बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर भेंजने में असफल है। राजनीतिक स्वार्थो के चलते घुसपैठियों को राशन कार्ड, मतदाता सूची में नाम अंकित कर उनसे सहानुभूति जतायी जा रही है। उन्होंने इन सभी समस्याओं के पिछे सरकार की ढुलमुल नीति को जिम्मेदार ठहराया।
श्री भागवत देश की आन्तरिक समस्याओं पर बोलते हुए कहा कि नक्सलवाद, उग्रवाद सहित अन्य प्रकार की समस्या जो हमारे सामने आ रही है उसके मूल में विदेशी ताकतें है। रंगनाथ कमेटी का बिना नाम लिये बगैर कहा कि संविधान के खिलाफ दिये जा रहे आरक्षण देश को बॉटने का काम करेगा न कि जोड़ने का इसलिए इस प्रकार के आरक्षण से सरकार को बचना चाहिए।। उन्होंने कहा कि भारत में तथाकथित अल्पसंख्यकों को इतनी अधिक सुविधाऐं दी जा रही है कि देश में बहुसंख्यक होना अपराध सा हो गया है।
उद्बोधन के प्रारम्भ में स्वयंसेवक घोश की थाप पर पथसंचलन करते हुए संघ समागम स्थल पर पहुंचे। सभा में सरसंघचालक जी के आने पर स्वयंसेवकों ने सरसंघचालक प्रणाम किया। तत्पश्चात ध्वजारोहण हुआ। श्री भागवत के उद्बोधन के पूर्व स्वयंसेवकों ने सूर्य नमस्कार, दण्ड, नियुद्ध आदि का प्रदर्सन किया।
इस संघ समागम में प्रमुख रुप से विहिप के अन्तर्राश्ट्रीय अध्यक्ष श्री अशोक सिंघल, पूर्व मानवसंसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी, पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी, पूर्व मंत्री डॉ नरेन्द्र सिंह गौर, लखनउ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं संघ के सह क्षेत्र संघचालक प्रो. देवेन्द्र प्रताप सिंह, पूर्व लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष प्रान्त संघचालक प्रो. कृश्ण बिहारी पाण्डेय, क्षेत्र प्रचारक अशोक बेरी, क्षेत्र कार्यवाह राम कुमार वर्मा, विद्याभारती के क्षेत्र संगठन मंत्री िशवकुमार, एंव प्रान्त प्रचारक िशवनाराण सहित अन्य स्वयंसेवक व कार्यकर्ता उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन प्रान्त शारीरिक िशक्षण प्रमुख रत्नाकार एवं अतिथियों का परिचय प्रान्त कार्यवाह डॉ विश्वनाथ लाल निगम ने किया।
उद्बोधन के प्रारम्भ में स्वयंसेवक घोश की थाप पर पथसंचलन करते हुए संघ समागम स्थल पर पहुंचे। सभा में सरसंघचालक जी के आने पर स्वयंसेवकों ने सरसंघचालक प्रणाम किया। तत्पश्चात ध्वजारोहण हुआ। श्री भागवत के उद्बोधन के पूर्व स्वयंसेवकों ने सूर्य नमस्कार, दण्ड, नियुद्ध आदि का प्रदर्सन किया।
इस संघ समागम में प्रमुख रुप से विहिप के अन्तर्राश्ट्रीय अध्यक्ष श्री अशोक सिंघल, पूर्व मानवसंसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी, पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी, पूर्व मंत्री डॉ नरेन्द्र सिंह गौर, लखनउ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं संघ के सह क्षेत्र संघचालक प्रो. देवेन्द्र प्रताप सिंह, पूर्व लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष प्रान्त संघचालक प्रो. कृश्ण बिहारी पाण्डेय, क्षेत्र प्रचारक अशोक बेरी, क्षेत्र कार्यवाह राम कुमार वर्मा, विद्याभारती के क्षेत्र संगठन मंत्री िशवकुमार, एंव प्रान्त प्रचारक िशवनाराण सहित अन्य स्वयंसेवक व कार्यकर्ता उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन प्रान्त शारीरिक िशक्षण प्रमुख रत्नाकार एवं अतिथियों का परिचय प्रान्त कार्यवाह डॉ विश्वनाथ लाल निगम ने किया।
इस टीके पर टीका टिपण्णी क्यों
सुभाष गाताडे
सर्वाइकल कैंसर से मुक्ति का शर्तिया इलाज के नाम से एक मल्टीनेशनल कंपनी द्वारा तैयार किए गए एचपीवी वैक्सिन के विज्ञापन को प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर तमाम लोगों ने देखा होगा। इस कैंसर से होने वाली मौतों को रोकने के लिए कंपनी आपको सलाह देती है कि आप अपनी बेटी को यह टीका अवश्य लगवाएं और सुरक्षित व निश्चिंत हो जाएं। यह अलग बात है कि इस टीके का प्रभाव सिर्फ चार साल तक ही रहता है और इसके चलते जिन किशोरियों-बच्चियों को यह टीका लगाया भी जा रहा हो, उन्हें अगर यौन संसर्ग की अवस्था में सक्रिय होने वाले इस वायरस से बचना है तो फिर इसे लगाना पड़ सकता है। पिछले दिनों चंद महिला संगठनों ने दिल्ली के इंडियन वुमेंस प्रेस कार्प्स में एक आमसभा करके इस मसले पर अपने सरोकार का इजहार किया और बताया कि किस तरह देसी-विदेशी बड़ी कंपनियां अपने मुनाफे के लिए स्ति्रयों के शरीरों का दोहन कर रही हैं। गौरतलब है कि इस मसले पर उनकी सक्ति्रयता जुलाई 2009 में शुरू हुई थी, जब उन्हें पता चला कि आंध्र प्रदेश और गुजरात के ग्रामीण इलाकों की लगभग तीस हजार आदिवासी किशोरियों को (जिनकी उम्र 10 से 14 साल के बीच थी) गार्डासिल नामक एक टीका लगाया जा रहा है और यह दावा किया जा रहा है कि इससे सर्वाइकल कैंसर को रोका जा सकेगा। इन महिला संगठनों ने जब चिकित्सा विशेषज्ञों की सहायता से अधिक जानकारी हासिल करने की कोशिश की तो उन्हें इस संबंध में कई अन्य विस्फोटक तथ्य उजागर हुए। उन्हें यह पता चला कि विकसित मुल्कों में पहले से प्रचलित इस टीके को लगाने के तमाम खतरनाक परिणाम सामने आ चुके हैं। इन टीकों से कई स्वस्थ किशोरियों की मौत मौत होने की खबरें भी आई हैं, जिससे कई कंपनियों को इस टीके की खेपों को बाजार से हटाना भी पड़ा है। इस बात को मद्देनजर रखते हुए कि प्रस्तुत परीक्षणों की तरफ भारत सरकार आंखें मूंदे हुए है, उन्होंने इस संबंध में एक ज्ञापन भी स्वास्थ्य मंत्रालय को भेजा। यह अलग बात है कि अब भी मंत्रालय इस मसले पर मौन है और एक तरह से मल्टीनेशनल कंपनियों और एनजीओ के साथ परीक्षणों में साझेदारी में संलिप्त है। निश्चित ही एचपीवी वैक्सिन के प्रसार से उजागर हुई प्रक्ति्रया में नया कुछ नहीं है। गौरतलब है कि आउटसोर्सिग के बढ़ते प्रचलन के दौर में बड़ी-बड़ी बहुदेशीय दवा कंपनियों द्वारा अपनी नई दवाओं के परीक्षण का बोझ तीसरी दुनिया के मुल्कों की जनता पर छोड़ने के मामले में कुछ भी अनोखा नहीं है। पिछले दिनों मुंबई में आयोजित पहले इंडिया फार्मा सम्मिट में इससे जुड़ी तमाम बातें सामने आई थीं। यह बात स्पष्ट हुई कि स्वास्थ प्रणाली की खामियों के चलते ऐसे प्रयोगों में वालंटियर बने लोगों की सुरक्षा का मसला अक्सर उपेक्षित ही रह जाता है। यहां तक कि मरीजों से हासिल की गई सहमति भी विवादास्पद दिखती है। यह अकारण नहीं कि ऐसे लोगों की सहज उपलब्धता के चलते जो गैर-जानकारी में या अपनी गरीबी के चलते ऐसी नई दवाओं का अपने शरीर पर प्रयोग करने के लिए तैयार रहते हैं और इन देशों की लचर स्वास्थ्य प्रणाली और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते आउटसोर्स किए गए चिकित्सकीय परीक्षणों का बाजार आज 12,000 हजार करोड़ रुपये से आगे निकल चुका है। मुंबई में आयोजित सम्मेलन में उद्योगपतियों के संगठन फेडरेशन ऑफ इंडियन चेंबर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज यानी फिक्की की तरफ से एक रिपोर्ट भी पेश की गई, जिसमें यह जोर भी दिया गया कि राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित करने के लिए उपयोगी प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है। न्यूयॉर्क के फोर्डहैम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर फाल्गुनी सेन द्वारा तैयार की गई प्रस्तुत रिपोर्ट में राष्ट्रीय हितों को भी अलग ढंग से परिभाषित किया गया था। इसके मुताबिक चिकित्सकीय परीक्षणों के लिए राष्ट्रीय हित का मतलब है ऐसी दवाएं, जो भारतीय आबादी के हिसाब से अधिक प्रासंगिक हों और अन्य मुल्कों में इसी किस्म की वरीयता नहीं हो। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि परीक्षणों के लिए भारत की परिस्थिति के मुताबिक, ऐसे पैमाने भी तय किए जा सकते हैं कि कौन-सी जांच यहां संभव नहीं होगी। इस फेहरिस्त में अन्य मुल्कों में पाबंदी लगाई गई दवाएं भी शामिल की जा सकती हैं। मालूम हो कि पिछले दिनों ड्यूक यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के मेडिकल रिसचर्स इस बात को लेकर चकित थे कि वर्ष 2007 में जिन नए ड्रग्स पर परीक्षण चले थे, उसके संबंध में एक तिहाई से अधिक परीक्षण अमेरिका के बाहर हुए थे। प्रस्तुत अध्ययन में अमेरिका की बीस बड़ी फार्मास्युटिकल्स कंपनियों ने 500 से अधिक चिकित्सकीय परीक्षणों का विश्लेषण किया था। अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि जिन बाहर के मुल्कों में इन परीक्षणों को अंजाम दिया गया, उसके बारे में कंपनियों के लिए पहले से स्पष्ट था कि उनकी इन दवाओं के लिए कोई खास बाजार मिलने वाला नहीं है। सभी जानते हैं कि तीसरी दुनिया के मुल्कों की बीमारियों और पहली दुनिया की बीमारियों में कुछ समानताएं मिल सकती हैं, लेकिन काफी फर्क भी है। ऐसी तमाम बीमारियां, जो यहां कभी-कभी महामारी का रूप धारण करती दिखती हैं, उनसे वहां लगभग काबू पा लिया गया है। टीबी जैसी बीमारी हो या दूषित जल से पैदा होने वाली डायरिया जैसी बीमारियां हों, वे कभी वहां उस किस्म का कहर नहीं बरपाया करतीं, जैसे कि वे तीसरी दुनिया के हिंदुस्तान जैसे मुल्कों में करती हैं। यह अकारण नहीं कि इन अध्ययनकर्ताओं को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि टीबी जैसी बीमारी के लिए तीसरी दुनिया के इन लोगों पर कोई चिकित्सकीय परीक्षण नहीं चले, भले ही यह बीमारी विकासशील देशों में आज भी बड़े पैमाने पर विद्यमान हो। गौरतलब है कि आम हिंदुस्तानी का बड़ी-बड़ी कंपनियों की दवाओं के लिए गिनीपिग बनने का सिलसिला कोई नया नहीं है। वर्ष 1997 में देश के प्रमुख कैंसर संस्थान इंस्टीटयूट फॉर साइटॉलॉजी एंड प्रिवेंटिव एनकोलॉजी के तहत चला एक अध्ययन काफी विवाद का विषय बना था, जब पता चला था कि 1100 ऐसी स्ति्रयां, जो सर्वाइकल डिसप्लेसिया (गर्भाशय के मुख पर कोशिकाओं के विकास) से पीडि़त थीं, का इलाज केवल इसलिए नहीं किया गया ताकि बीमारी किस तरह बढ़ती है, उसका अध्ययन किया जाए। इसके बाद भी जब अस्वाभाविक बढ़त देखी गई और सर्वाइकल कैंसर की आशंका महसूस की गई, तब भी न तो उन स्ति्रयों को इसके बारे में चेतावनी दी गई और न ही उनका इलाज किया गया, बल्कि चूहों की तरह उन पर परीक्षण जारी रहा। ज्यादा विचलित करने वाली बात यह थी कि यह समूचा अध्ययन देश के एक अग्रणी चिकित्सकीय खोज संस्थान के बैनर तले संचालित हो रहा था, जिस पर चिकित्सकीय शोध की नैतिक मार्गदर्शिका बनाने की प्रमुख जिम्मेदारी थी। इसमें कोई दोराय नहीं कि जब तक चिकित्सकीय नैतिकता के केंद्र में जानकारी के साथ सहमति का मसला नहीं रहेगा, तब तक ऐसे प्रयोगों का बार-बार दोहराव हम देखते रहेंगे। इसके लिए तैयार की जा रही मार्गदर्शिकाओं में न केवल नई तकनीकों व शोधों से उत्पन्न चुनौतियों का जिक्र होना चाहिए, बल्कि बदली सामाजिक परिस्थितियां जैसे भारत जैसे समाज में व्याप्त लिंग व वर्ग असमानता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
साभार दैनिक जागरण
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